समाज साहित्य

"शूल "

"शूल " तुम गुलाब का फूल प्रिये, मै एक शूल बेचारा हूँ ;
तुम बिन अब जाऊँ कहाँ ? तन मन तुझपे वारा हूँ !
तुम जो यूँ खिल जाते हों , फ़िर बावरा मुझे बनाते हों;
और मंद हों जब मुस्काते हों; मेरे दिल को बड़ा सताते हों ......
बन सावन में बारिश सा जब ! मुझ पर झर- झर जाते हों .....
बन जाता हूँ मै नाव सा और, तुझ संग बहता जाता हूँ ;
तू गुलाब का फूल प्रिये , मै एक शूल बेचारा हूँ ;
जो छूने तुझको आयेगा.... भेदा मेरे द्वारा जायेगा;
 मुझसे न बच पायेगा ,हों रक्तरंजित जायेगा ;