" मुझे थोड़ा मैं होने दो ", " कभी कभी कविता यूं ही मचल उठती है " - प्रिया मिश्रा " वेंणी " की 2 कविताएं

priya mishra

priya mishra 1

"मुझे थोड़ा मैं होने दो"

मुझे थोड़ा मैं होने दो
मैं ज़र्रा ज़र्रा बहक रही
मुझे थोड़ा स्थिर होने दो
मुझे थोड़ा मैं होने दो
मैं तुममे खोती बहकी बहकी
पागल सी बन फिरती हूँ
मेरे #विरह के दर्द को
थोड़ा कम होने दो
मुझे थोडा मैं होने दो
मैं हर पल याद में तेरी
तुझ सी बाते करती हूँ
#बेबात ही हँसती हूँ
और यूं ही रोती #सिसकती हूँ
मुझे अपने आँसुओ को
जरा पी लेने दो
मुझे थोड़ा मैं होने दो
बंद खिड़की के पीछे
जानते हुए की तुम नही आओगे
कई कई घंटे अकेले
खड़े हो यूं ही राह ताकती हूँ
मुझे तुम्हारे न आने का यकीन होने दो
#मुझे_थोड़ा_मैं_होने_दो
लोगो की बाते कोशिशों बाद भी
ध्यान नही चढ़ती
उन बातों को जरा
कानो में घुलने दो
मुझे जरा मैं होने दो
यूं ही #अकेले चलते हुए सड़क पर
तुम्हारे हाँथो को थामने हाँथ बढ़ते ही
उन हाँथो को न पाने का अहसास होने दो
मुझे थोड़ा मैं होने दो
हर तरफ #बिखरी यादों की
एक बांधती पोटली से
तुम्हारी की यादे फिर #टटोलने दो
मुझे तुम हो कर
फिर मैं होने दो
#मुझे #सिर्फ
#तुम्हारी
#मैं #होने #दो
मुझे थोड़ा मैं होने दो.....
- वेणी

"कभी कभी कविता यूं ही मचल उठती है"

कभी कभी कविता यूं ही मचल उठती है
मुझसे तेरी बाते करने के लिये
कभी कभी वो करती है जिक्र
हमारे बीते हुए लम्हो का
कभी यूं ही कह उठती है
तेरे मेरे प्यार के किस्से
दबी जुबां से उठे शोर में
कभी कहती है चीख कर
की बेहद है इश्क़ तुमसे
कभी न जाने किस हद को
नापने की कोशिश करती है
कभी कहती है
सांसो की मध्यम और उच्च लय
तुम्ही तो हो
कभी मेरे जीवन के संगीत राग को
बिन मेरी इजाजत तुम्हारे नाम कर देती है
कभी बिना कुछ कहे
बेजुबाँ हो
बस आंखों ही आंखों से सारी बाते कर जाती है
कभी आंखों में झिलमिल मोती लिये
कह जाती है प्रेम विरह से उठती टीस को
सुनो
बेहद बोझिल सा हो उठता है
कुछ भी कहना तुमसे
जब तुमसे सब कह देना चाहती हूं
पर आंखे जुबां को मौका ही नही देती
और कोरो से ढुलकते वो सितारे
बिना बोले तुम्हे मैं मुझे तुम
होने का अहसास करा जाते है
सुनो
प्यार कविता का सागर है
और सागर वेणी की इबादत
अब कान्हा वेणी
सागर कान्हा
सब मिल एक हो मुस्कुरा उठते है
एक कविता में
जो लिखी गई होती है
बस यूं ही.....
-!!वेणी!!