मुक्ति के लिए तो एक क्षण बहुत है, इसलिए भगवान से मांगो तो भक्ति
इन्द्रेश जी की कथा में आज भी बरसी इन्द्रदेव की कृपा, भक्तों की भीड़ उमड़ी
रायपुर (खबरगली ) राजधानी रायपुर के देवेन्द्रनगर स्थित मंडी ग्राउंड में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भागवताचार्य इन्द्रेश जी महाराज ने मुक्ति और भक्ति का अंतर बताते हुए कहा कि मुक्ति के लिए एक क्षण भी पर्याप्त है, लेकिन जीवन के हर क्षण को भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। लगातार हो रही बारिश के बावजूद कथा स्थल पर श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ उमड़ी। कथा के दौरान इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय भगवान के दर्शन की कामना करता है, वह मुक्ति की ओर जाता है, जबकि जो व्यक्ति जीते-जी भगवान के दर्शन और भक्ति की इच्छा रखता है, वह भक्त है। उन्होंने कहा कि जीवन में भगवान का स्मरण और भक्ति अंतिम सांस तक जारी रहनी चाहिए।
इन्द्रेश महाराज ने बताया मुक्ति और भक्ति में अंतर मुक्ति के लिए एक क्षण भी पर्याप्त
इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि मुक्ति के लिए तो एक क्षण भी बहुत है, लेकिन जीवन में जितने दिन मिले हैं, उन्हें भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। उन्होंने भगवान के नाम स्मरण, पूजा-पाठ और धार्मिक आचरण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि जीवनभर भगवान का स्मरण किया जाए तो अंतिम समय में भी प्रभु की स्मृति बनी रहती है। मनुष्य ने जीवन में कितना धन, यश और वैभव कमाया, इसका वास्तविक अर्थ तभी है, जब उसका जीवन भगवान के स्मरण और सद्कर्मों से जुड़ा हो।
बारिश के बीच कथा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ इन्द्रेश महाराज बोले- इन्द्रदेव की कृपा बरस रही है
रायपुर में लगातार हो रही बारिश के बीच कथा में व्यवधान की आशंका थी, लेकिन कथा सुचारू रूप से जारी रही। व्यासपीठ पर पहुंचते ही इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि “इन्द्रेश की कथा में इन्द्रदेव की कृपा बरस रही है।” उन्होंने कहा कि रायपुरवासियों का उत्साह और श्रद्धा देखते ही बन रही है। कथा के चौथे दिन मंडी ग्राउंड, देवेन्द्रनगर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। कथा के दौरान जगन्नाथ प्रभु के वामन स्वरूप का उल्लेख किया गया। इसके साथ ही किशोरी जी की छठी और नंदोत्सव का प्रसंग भी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
असंतुष्ट व्यक्ति भगवान का भक्त नहीं हो सकता
भक्ति के मार्ग में संतोष का विशेष महत्व* इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि संसार में सबसे अधिक प्रसन्न वही व्यक्ति है, जिसके भीतर संतोष है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति यह मानता है कि “जो है, जितना है, वही पर्याप्त है”, उसके जीवन में शांति बनी रहती है। उन्होंने कहा कि असंतोष व्यक्ति को गलत रास्ते की ओर ले जा सकता है। विशेष रूप से भक्ति के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के भीतर संतोष का भाव होना जरूरी है। शास्त्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि असंतुष्ट व्यक्ति भगवान का सच्चा भक्त नहीं हो सकता।
वेद व्यास जी को कब मिली संतुष्टि?
कथा के दौरान इन्द्रेश जी महाराज ने वेद व्यास जी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत की रचना करने के बाद भी वेद व्यास संतुष्ट नहीं थे। उन्हें बताया गया कि उन्होंने भगवान के यश और ऐश्वर्य का वर्णन तो किया, लेकिन भगवान की निकुंज लीलाओं का पर्याप्त वर्णन नहीं किया। भगवान की उन लीलाओं का स्मरण कराया गया, जिनमें वे गोपियों के प्रेम और भाव से जुड़ते हैं तथा यशोदा और किशोरी जी के साथ विभिन्न लीलाएं करते हैं। इन लीलाओं का चिंतन और वर्णन करने के बाद वेद व्यास जी को संतुष्टि प्राप्त हुई।
भगवान के अवतार का श्रेय भक्तों को भक्तों के प्रेम के कारण भगवान लेते हैं अलग-अलग अवतार
इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि भगवान एक हैं, लेकिन वे अलग-अलग रूपों में अवतार लेते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान के अवतार का एक कारण उनकी सर्वव्यापकता को स्थापित करना है, वहीं वे अपने भक्तों के प्रेम और भाव का रसास्वादन भी करते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान के अवतार का श्रेय भक्तों की प्रधानता को जाता है। भक्तों के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और भाव होता है और इसी प्रेम के कारण भगवान विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। उन्होंने वेद व्यास जी के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि जो व्यवहार हमें अपने लिए अच्छा नहीं लगता, वह दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। असहाय व्यक्ति की सहायता करना पुण्य का कार्य है।
गुरु खोजने से नहीं, भाव और संबंध से मिलते हैं
सच्चा गुरु जीवन को भगवान की ओर ले जाता है इन्द्रेश जी महाराज ने गुरु की महत्ता बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के प्रभाव में आकर उसे गुरु नहीं मान लेना चाहिए। गुरु वही हैं, जिनके साथ भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित हो। उन्होंने कहा कि सच्चे गुरु के केवल शब्द और ज्ञान ही प्रभावी नहीं होते, बल्कि उनके भीतर प्रेम और अनुराग भी होता है। जिनके दर्शन मात्र से मन को समाधान मिले, लेकिन जिज्ञासा बनी रहे और उनके उत्तर से मन को परम विश्राम प्राप्त हो जाए, वही गुरु हैं। उन्होंने कहा कि गुरु के चरणों में दृढ़ विश्वास होना चाहिए। जिनके सामने आने के बाद मनुष्य की सांसारिक इच्छाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगें और जीवन भगवान की ओर मुड़ जाए, वही सच्चे गुरु हैं।
इन्द्रेश महाराज की कथा में श्रद्धालुओं का उत्साह
देवेन्द्रनगर मंडी ग्राउंड में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। कथा के दौरान भक्ति, संतोष, गुरु महिमा, भगवान के अवतार और मुक्ति जैसे विषयों पर इन्द्रेश जी महाराज ने विस्तार से प्रवचन दिया। मुख्य संदेश: इन्द्रेश महाराज ने श्रद्धालुओं से जीवन में संतोष रखने, भगवान का निरंतर स्मरण करने, असहायों की सहायता करने और सच्चे गुरु के प्रति श्रद्धा रखने का संदेश दिया।
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