रायपुर (खबरगली )राजधानी का नगर निगम इन दिनों केवल 'बंद कमरों की बैठकों' का केंद्र बनकर रह गया है। कभी विधायक, कभी महापौर तो कभी आयुक्त महोदय की मैराथन बैठकें रोजाना की कार्यप्रणाली का हिस्सा बन चुकी हैं। विडंबना यह है कि बैठकें तो दिन-रात चल रही हैं, लेकिन आम जनता की मूलभूत सुविधाओं के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
बैठकों में व्यस्त अधिकारी, कुर्सियों से नदारद
अधिकारियों से संपर्क करने पर सिर्फ एक ही जवाब मिलता है—"साहब बैठक में हैं।" बैठकों की इस कदर अति हो चुकी है कि अधिकारी अब अपनी कुर्सियों पर बैठकर जनता की समस्याएं सुनने का समय भी नहीं निकाल पा रहे हैं। इस कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने कहा, "बैठक ही नगर निगम का मुख्य उद्देश्य नहीं है। अगर दिन-रात सिर्फ बैठकें ही होंगी तो धरातल पर कार्य कब होगा? जनता ने महापौर को अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए चुना है, केवल बंद कमरों की बैठकों के लिए नहीं।"
टैक्स वसूली में सख्ती, जनता की सहूलियत पर चुप्पी
रायपुर नगर निगम जिस मुस्तैदी के साथ संपत्ति कर (प्रॉपर्टी टैक्स) वसूली के लिए अधिकारियों की जवाबदेही और जिम्मेदारी तय कर रहा है, वैसी ही कड़ाई आम जनता की बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों नहीं दिखाई जाती? यह एक बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है। अगर मूलभूत सुविधाओं के लिए भी इसी तरह जिम्मेदारी तय की जाती, तो आज राजधानी रायपुर की तस्वीर और स्वरूप कुछ और ही होता।
लचर सफाई व्यवस्था: फिर डूबने की कगार पर रायपुर
नगर निगम की लचर सफाई व्यवस्था का खामियाजा जनता भुगत चुकी है। इतिहास में पहली बार रायपुर शहर के सभी 70 वार्ड पानी में डूब गए थे। लोगों के घरों में गंदा पानी घुसने से दैनिक उपयोग की वस्तुओं का भारी नुकसान हुआ और नागरिकों को बड़ा आर्थिक आघात लगा। इसके बावजूद निगम प्रशासन की नींद नहीं खुली है। वार्डों की समस्याओं को लेकर 'विशेष सामान्य सभा' भी बुलाई गई, लेकिन उसका परिणाम आज तक धरातल पर दिखाई नहीं दिया है। स्थिति यह है कि यदि आज भी शहर में लगातार 24 घंटे बरसात हो जाए, तो रायपुर एक बार फिर पूरी तरह डूब जाएगा।
दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर
कागजी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर इन तीन बड़े उदाहरणों से साफ समझा जा सकता है:
ठप पड़ा सिटी डेवलपमेंट प्लान
महापौर द्वारा वर्ष 2025 में शहर के सभी 70 वार्डों के विकास के लिए 'सिटी डेवलपमेंट प्लान' तैयार किया गया था। एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह योजना आज तक लागू नहीं हो पाई है।
टेबलों तक सीमित जल बोर्ड
जनवरी 2026 में बड़े जोर-शोर के साथ 'जल बोर्ड' का गठन किया गया था। छह महीने बीतने के बाद भी इसके कार्य केवल नगर निगम मुख्यालय की फाइलों और ऑफिस टेबल तक ही सीमित हैं।
सपनों की गारमेंट फैक्ट्री पर ताला
मोवा में हजारों महिलाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से 'वुमेन गारमेंट फैक्ट्री रोजगार केंद्र' बनाया गया था। यह केंद्र आज भी शुरू होने की बाट जोह रहा है और बनकर धूल खा रहा है।सच्चाई यही है कि लगातार होती बैठकों के बाद भी रायपुर की जनता आज बुनियादी सुविधाओं, साफ-सफाई और जलभराव जैसी समस्याओं से जूझ रही है। बैठकों के लिए एक निश्चित तिथि और समय तय होना बेहद जरूरी है ताकि अधिकारी अपनी कुर्सियों पर बैठकर जनता के प्रति जवाबदेह बन सकें।
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