हरेली पर नीम की डालियां तोड़ने से पहले पढ़ें ये खबर, डॉ. दिनेश मिश्र ने दिया प्रकृति बचाने का संदेश

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रायपुर (खबरगली ) छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और प्रकृति से जुड़ा लोकपर्व हरेली 2026 इस बार सिर्फ खेती-किसानी और हरियाली का उत्सव ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहा है। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. दिनेश मिश्र ने नागरिकों से अपील की है कि हरेली की परंपराओं को निभाते समय प्रकृति और पेड़-पौधों को नुकसान न पहुंचाएं। उन्होंने खास तौर पर नीम की बड़ी-बड़ी डालियां तोड़ने से बचने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि हरेली पर नीम की जरूरत हो तो पेड़ से केवल कुछ पत्तियां ही ली जाएं, शाखाओं को काटना या बड़ी टहनियां तोड़ना उचित नहीं है।

हरेली पर नीम की डालियां तोड़ना कितना सही?

छत्तीसगढ़ में हरेली पर्व के दौरान घरों के दरवाजे और वाहनों पर नीम की पत्तियां अथवा छोटी टहनियां लगाने की परंपरा कई जगह देखने को मिलती है। इसे लोग बुरी नजर से बचाव सहित विभिन्न पारंपरिक मान्यताओं से जोड़कर देखते हैं। लेकिन डॉ. दिनेश मिश्र का कहना है कि बदलते पर्यावरणीय हालात में परंपराओं को प्रकृति के अनुकूल बनाना जरूरी है।

एक ही दिन में बड़ी संख्या में पेड़ों पर पड़ सकता है दबाव

आज शहरों के विस्तार, बढ़ती आबादी और लगातार कम होते हरित क्षेत्रों के कारण पेड़-पौधों पर पहले से ही दबाव है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में लोग एक ही दिन नीम के पेड़ों से बड़ी-बड़ी शाखाएं तोड़ेंगे, तो इसका पेड़ों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। डॉ. मिश्र ने कहा कि हरेली जैसे प्रकृति आधारित पर्व का उद्देश्य ही हरियाली और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करना है। इसलिए पर्व मनाते समय प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए।

पेड़ भी जीवित प्राणी हैं, उन्हें भी चोट लगती है

डॉ. दिनेश मिश्र ने नागरिकों को पेड़ों की जैविक भूमिका समझाते हुए कहा कि पेड़ भी जीवित प्राणी हैं। उनकी हरी पत्तियां सूर्य के प्रकाश की सहायता से भोजन बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अनावश्यक रूप से बड़ी मात्रा में पत्तियां तोड़ने और शाखाओं को काटने से पेड़ पर तनाव पड़ सकता है। शाखाओं पर चोट लगने से घाव भी बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह किसी जीवित प्राणी को अनावश्यक चोट पहुंचाना उचित नहीं माना जाता, उसी तरह पेड़-पौधों के प्रति संवेदनशीलता और करुणा रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।

हरेली मनाएं, लेकिन प्रकृति के साथ

डॉ. मिश्र ने कहा कि हरेली की परंपराओं को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए, लेकिन इसका तरीका ऐसा हो जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। हरेली पर क्या करें?* नीम की बड़ी-बड़ी डालियां न तोड़ें। जरूरत के अनुसार केवल कुछ पत्तियां लें। पेड़ों की शाखाओं को काटने से बचें। हरेली पर नीम और अन्य उपयोगी पौधे लगाएं। प्रकृति के प्रति सम्मान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ परंपराओं का पालन करें।

परंपरा और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ

डॉ. दिनेश मिश्र ने कहा कि हमारी परंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं और उन्हें आगे बढ़ाना जरूरी है। लेकिन पर्यावरणीय परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं, इसलिए परंपराओं को भी प्रकृति के हित में अपनाने की जरूरत है। हरेली का मूल भाव ही हरियाली, खेती और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा है। ऐसे में जिस दिन हम प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, उसी दिन पेड़ों को अनावश्यक नुकसान पहुंचाना पर्व की मूल भावना के विपरीत होगा।

डॉ. दिनेश मिश्र का संदेश

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र ने नागरिकों से हरेली को पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ मनाने का आह्वान किया।


“परंपरा भी निभाएंगे, पेड़ भी बचाएंगे। हरेली मनाएंगे, हरियाली बचाएंगे।”


उन्होंने नागरिकों से अपील की कि इस हरेली पर केवल पर्व न मनाएं, बल्कि एक पेड़ बचाने और एक पौधा लगाने का संकल्प भी लें।