आचार्य अमरनाथ त्यागी की कलम से
साहित्य डेस्क (खबरगली )
जीवात्मा का कारण शरीर से संबंध ही कर्मफल भोगने के लिए बारंबार जन्म का निमित्त है। संख्या के अनुसार कारण शरीर तेरह करणों से बनता है। यथा—बुद्धि, अहंकार, मन (ये तीन अंतःकरण) तथा पंच कर्मेंद्रियाँ और पंच ज्ञानेंद्रियाँ (10 बाह्यकरण)। जिस प्रकार 13 वर्णों की किसी वर्णमाला द्वारा कुल कितने शब्द बन सकते हैं, उसी विधि से यह गणना की जा सकती है कि किसी एक योनि में अधिकतम कितने प्राणी हो सकते हैं। यह संख्या है तेरह का फैक्टोरियल।
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