प्रकृति का गणित और युद्धों की विभीषिकाएं

Mathematics of nature and the horrors of war, Acharya Amarnath Tyagi, Raipur, Chhattisgarh, Khabargali

आचार्य अमरनाथ त्यागी की कलम से

साहित्य डेस्क (खबरगली )

जीवात्मा का कारण शरीर से संबंध ही कर्मफल भोगने के लिए बारंबार जन्म का निमित्त है। संख्या के अनुसार कारण शरीर तेरह करणों से बनता है। यथा—बुद्धि, अहंकार, मन (ये तीन अंतःकरण) तथा पंच कर्मेंद्रियाँ और पंच ज्ञानेंद्रियाँ (10 बाह्यकरण)। जिस प्रकार 13 वर्णों की किसी वर्णमाला द्वारा कुल कितने शब्द बन सकते हैं, उसी विधि से यह गणना की जा सकती है कि किसी एक योनि में अधिकतम कितने प्राणी हो सकते हैं। यह संख्या है तेरह का फैक्टोरियल।

तेरह के फैक्टोरियल का क्या अर्थ है, अर्थात् 13! = 1×2×3×4×5×6×7×8×9×10×11×12×13 = 6,22,70,20,800 = 622 करोड़, 70 लाख, 20 हजार 800। अथवा किसी भी योनि में किसी एक काल में इससे अधिक प्राणी नहीं हो सकते। इससे अधिक अर्थात अलग 14! फैक्टोरियल 8718 करोड़ है, जिसका भार पृथ्वी नहीं सहन कर सकती। इसलिए पृथ्वी जितना भार सहन कर सकती है, उससे अधिक हो जाने पर प्रकृति स्वयं अपनी योजना के अनुसार किसी न किसी रूप में किसी भी व्यक्ति के अंदर अहंकार की मात्रा को इतना तीव्र कर देती है कि उसके तानाशाही रवैये के कारण युद्ध की विभीषिका भड़क उठती है या यह उग्र रूप धारण करते हुए विश्व युद्ध का रूप ले लेती है, जिससे पृथ्वी के अनावश्यक तत्वों का विनाश हो जाता है। इसके अतिरिक्त प्रकृति महामारी के द्वारा भी अपने भार को संतुलित कर देती है। इसलिए युद्ध की विभीषिका धरती के भार के संतुलन को बनाए रखते हुए अगली पीढ़ियों को गलतियाँ न दोहराने के लिए प्रेरित करती है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि विश्व शांति के लिए जनसंख्या विस्फोट को रोकना तथा उसे संयमित और नियंत्रित करना परम आवश्यक है। इसका अर्थ यह भी है कि यदि इतने मनुष्यों की कुंडलियाँ और फलादेश बनाकर रख लिए जाएँ, तो प्रत्येक युग और प्रत्येक सृष्टि में सभी मनुष्यों का ज्योतिषीय फलादेश उन कुंडलियों के आधार पर किया जा सकता है। यही भृगु संहिता और नाड़ी जैसे ग्रंथों का सैद्धांतिक आधार है। जिस प्रकार मानवीय जीनोम प्रोजेक्ट पर अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं, उसी प्रकार मानवीय बर्थ-डाटा प्रोजेक्ट की आवश्यकता है, जिसमें हजारों गुना कम धन व्यय होगा। अभी मानवों की जनसंख्या अधिकतम सीमा पर है। यदि सभी व्यक्तियों के नाम, जन्मकाल, जन्मस्थान और जीवन की प्रमुख घटनाओं का डेटाबेस तैयार कर लिया जाए, तो सभी युगों के लिए संपूर्ण भृगु संहिता बनाने का ठोस आधार तैयार हो जाएगा। पाराशर होराशास्त्र से इसमें विशेष मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है।

यदि धरती की सहनशक्ति से अधिक जनसंख्या हो जाती है, तो प्रकृति अपने फैक्टोरियल गणित के अनुसार किसी न किसी हिस्से में युद्ध की विभीषिका जगा देती है या जनसंख्या नियंत्रण के लिए वैश्विक महामारी का प्रकोप फैल जाता है। . आज के वैज्ञानिक युग में भी इस स्तर पर अंतरराष्ट्रीय अध्ययन किया जा रहा है, जिसने दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है।

Environment Research Latest की रिपोर्ट के मुताबिक, पृथ्वी पर मौजूद 8.3 अरब की आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर इतना अधिक दबाव डाल रही है कि ग्रह के पुनर्जीवित होने की क्षमता कमजोर पड़ रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इंसान संसाधनों का उपयोग पृथ्वी की क्षमता से लगभग 70 से 80% अधिक तेजी से कर रहे हैं। इसका मतलब है कि मौजूदा जीवनशैली को बनाए रखने के लिए हमें लगभग 1.7 से 1.8 पृथ्वी की आवश्यकता होगी।

अपनी सीमा को पार कर चुकी है पृथ्वी की आबादी दो शताब्दियों की जनसंख्या पर आधारित स्टडी में दावा 

एक नई स्टडी के अनुसार 8.3 अरब की आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल रही है, जिससे पृथ्वी की पुनर्जीवित होने की क्षमता कमजोर पड़ रही है। हम अपनी जीवनशैली के लिए 1.7 से 1.8 पृथ्वी के बराबर संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी की आदर्श वहन क्षमता 2.5 अरब आबादी के लिए है। . ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी (Flinders University) के वैज्ञानिक कोरी ब्रैडशॉ (Korey Bradshaw) के नेतृत्व में हुई रिसर्च में बताया गया है कि मानव अपने संसाधनों की सीमा पार कर चुका है।वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की वहन क्षमता (carrying capacity), जिसके अंतर्गत कोई प्रजाति उपलब्ध संसाधनों के आधार पर लंबे समय तक जीवित रह सकती है, अब मानव आबादी के सामने कम पड़ रही है।

दो शताब्दियों की जनसंख्या पर आधारित रिपोर्ट 

यह स्टडी दो शताब्दियों की जनसंख्या पर आधारित है। रिपोर्ट बताती है कि इतिहास में एक समय ऐसा था, जब मानव आबादी और संसाधनों का उपयोग संतुलन में था, लेकिन 1950 के बाद तेजी से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण और बढ़ती खपत ने संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। इंसान अपनी तकनीकी क्षमताओं के कारण इस सीमा को लगातार आगे बढ़ाता रहा है। खासकर जनसंख्या वृद्धि और जीवाश्म ईंधन के उपयोग ने प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। . केयरिंग कैपेसिटी शब्द की शुरुआत 19वीं सदी के अंत में जहाज उद्योग से हुई थी, जब कोयले से चलने वाले जहाजों में माल और ईंधन के संतुलन का आकलन किया जाता था। यही सिद्धांत आज पृथ्वी और मानव जीवन पर लागू हो रहा है। 2070 तक चरम पर पहुंच सकती है जनसंख्या . इस अध्ययन के अनुसार 1950 के बाद एक ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसे वैज्ञानिक नकारात्मक जनसंख्या चरण कहते हैं। इसका अर्थ है कि अब जनसंख्या बढ़ने से आर्थिक और सामाजिक विकास की गति नहीं बढ़ती, बल्कि इसके विपरीत दबाव और समस्याएँ बढ़ती हैं। कोरी ब्रैडशॉ के मुताबिक, यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो वैश्विक जनसंख्या 2060 से 2070 के दशक के बीच 11.7 से 12.4 अरब के बीच अपने चरम पर पहुंच सकती है। इसलिए जनसंख्या विस्फोट को संयमित और नियंत्रित करना ही विश्व शांति की कुंजी है, अन्यथा युद्धों की विभीषिकाओं को रोकना कठिन होगा।