रायपुर (खबरगली ) छत्तीसगढ़ सरकार ने अवैध धर्मांतरण के खिलाफ निर्णायक कदम उठाते हुए विधानसभा में ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026’ को ध्वनि मत से पारित कर दिया है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा पेश किए गए इस विधेयक में छल, बल, प्रलोभन या धोखाधड़ी से कराए गए धर्मांतरण को लेकर बेहद कड़े दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं।इस दौरान जहाँ सत्ता पक्ष के विधायकों ने 'जय श्री राम' के नारों से सदन को गुंजा दिया, वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने विरोध जताते हुए सदन से वॉकआउट किया।
कड़े दंड का प्रावधान: जेल और भारी जुर्माना
इस नए कानून का मुख्य उद्देश्य बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर कराए जाने वाले धर्मांतरण पर प्रभावी रोक लगाना है। विधेयक के तहत अपराधों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर कड़ी सजा तय की गई है:
सामूहिक धर्मांतरण: दोषी पाए जाने पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और 25 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।
विशेष श्रेणी (महिला, SC-ST, दिव्यांग): नाबालिगों, महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति और मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के धर्मांतरण पर 10 से 20 साल की जेल और 10 लाख रुपये जुर्माना होगा।
सामान्य अवैध धर्मांतरण: दबाव, लालच या डिजिटल माध्यम से किए गए धर्मांतरण पर 5 से 10 साल की जेल और 5 लाख रुपये जुर्माना तय किया गया है।
विदेशी फंडिंग व तस्करी: धर्मांतरण के लिए विदेशी धन का उपयोग करने या मानव तस्करी/भय के माध्यम से धर्म बदलवाने पर 10 से 20 साल की कैद और 30 लाख रुपये तक का जुर्माना लगेगा।
स्वेच्छा से धर्मांतरण के नियम: यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म बदलना चाहता है, तो उसे अब जिला मजिस्ट्रेट (DM) को पूर्व सूचना देनी अनिवार्य होगी। पारदर्शिता के लिए इस विवरण को सार्वजनिक किया जाएगा ताकि किसी भी प्रकार की आपत्ति दर्ज कराई जा सके।
डिजिटल माध्यमों पर भी नजर
इस कानून की एक खास बात यह भी है कि इसमें डिजिटल माध्यमों के जरिए किए जाने वाले अवैध धर्मांतरण को भी शामिल किया गया है, ताकि आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग को रोका जा सके।
सदन में विपक्ष ने किया हंगामा और वॉकआउट
विधेयक पारित होते ही सत्ता पक्ष के विधायकों ने 'जय श्री राम' के नारों के साथ इसका स्वागत किया। दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया और असहमति जताते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया। विपक्ष के नेता चरणदास महंत ने तर्क दिया कि इसी तरह के मामले पहले से ही 11 राज्यों में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष हैं और उन्होंने विधेयक को एक चयन समिति को भेजने का आग्रह किया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में मामलों की सुनवाई जारी रहने के दौरान कानून बनाने के खिलाफ चेतावनी दी और अंबेडकर, वाजपेयी और बुद्ध के शब्दों का हवाला देते हुए एकता, सहिष्णुता और सामाजिक न्याय पर जोर दिया।
राज्य सरकार की बड़ी जीत
इस विधेयक के पास होने को राज्य सरकार की तुष्टिकरण के खिलाफ और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि यह कानून राज्य की सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने और निर्दोष लोगों को प्रलोभन या दबाव से बचाने में मील का पत्थर साबित होगा।
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